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B.S.H.S SCHOOL · UPSC EDITORIAL ANALYSIS

अध्ययन संग्रह — यह पुरानी घटना पर आधारित विश्लेषण है, आज की खबर नहीं।

दलहन मिशन की पहली वर्षगांठ: बेहतर बीज और भरोसेमंद बाजार को जोड़ने की पहल

घटना / स्रोत की तारीख: 11 Oct 2026

GS 3: कृषि, फसल उत्पादकता, कृषि सामग्री, खरीद, खाद्य प्रसंस्करण और आर्थिक विकास। GS 2: सरकारी कार्यक्रमों का क्रियान्वयन और पोषण सुरक्षा। प्रारंभिक परीक्षा GS-I: समसामयिक घटनाएं, आर्थिक एवं सामाजिक विकास तथा सामान्य विज्ञान।

पीआईबी का वर्षगांठ विवरण 11 अक्टूबर 2025 को शुरू हुए दलहन आत्मनिर्भरता मिशन की समीक्षा करता है। उत्पादन और प्रसंस्करण ढांचे के लक्ष्य अभी लक्ष्य हैं, जबकि बीज वितरण, प्रसंस्करण की प्रगति और कृषि अनुमानों के आंकड़े शुरुआती क्रियान्वयन के अलग-अलग संकेत देते हैं। [1][3]

पहले विषय को समझें

1

दलहन और प्रोटीन सुरक्षा

दलहन प्रोटीन से भरपूर खाद्य फसलें हैं और भारतीय भोजन में इनका महत्वपूर्ण स्थान है। पीआईबी के अनुसार इनमें 20–25% प्रोटीन होता है और भारत इनका सबसे बड़ा उत्पादक है।

इनकी उपलब्धता कृषि उत्पादन को पोषण सुरक्षा से जोड़ती है। [1]

2

घोषणा, मंजूरी और शुरुआत

मिशन की घोषणा 2025–26 के बजट में हुई, केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 1 अक्टूबर 2025 को इसे मंजूरी दी और 11 अक्टूबर 2025 को इसकी शुरुआत हुई। ये नीति प्रक्रिया के अलग-अलग पड़ाव हैं।

इसकी कार्यान्वयन अवधि 2025–26 से 2030–31 है और स्वीकृत परिव्यय ₹11,440 करोड़ है। [2][3]

3

उत्पादन और उत्पादकता

उत्पादन का अर्थ कुल उपज है, जबकि उत्पादकता से प्रति इकाई कृषि भूमि की उपज समझी जाती है। सरकार ने 2030–31 तक 350 लाख टन उत्पादन, 310 लाख हेक्टेयर क्षेत्र और प्रति हेक्टेयर 1,130 किलोग्राम उपज का लक्ष्य रखा है।

ये अंतिम अवधि के अपेक्षित परिणाम हैं, पूरी हो चुकी उपलब्धियां नहीं। [1][2]

4

बीज उत्पादन की श्रृंखला

प्रजनक बीज के उत्पादन की निगरानी भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, यानी आईसीएआर को करनी है। आधार और प्रमाणित बीजों के उत्पादन की जिम्मेदारी राज्य तथा केंद्रीय एजेंसियों की है।

साथी पोर्टल बीज आपूर्ति श्रृंखला का रिकॉर्ड रखता है और क्षेत्रीय परीक्षणों से बेहतर किस्मों की स्थानीय उपयुक्तता जांची जानी है। [2]

5

सुनिश्चित खरीद और उसकी शर्तें

मिशन में अरहर, उड़द और मसूर को प्राथमिकता दी गई है। भाग लेने वाले राज्यों में पंजीकरण और समझौता करने वाले किसानों से पीएम-आशा की मूल्य समर्थन योजना के तहत नैफेड और एनसीसीएफ को 100% खरीद करनी है।

वर्षगांठ विवरण में खरीद अवधि 2025–26 से 2028–29 बताई गई है; इसलिए यह व्यवस्था शर्तों और समय-सीमा से जुड़ी है। [1][2]

संदर्भ: यह विषय क्यों महत्वपूर्ण है

11 अक्टूबर 2026 को जारी पीआईबी का पहली वर्षगांठ का विवरण मिशन को दलहन आयात पर निर्भरता घटाने के प्रयास से जोड़ता है। शुरुआत से पहले मंत्रिमंडल की मंजूरी मिली थी। कार्यक्रम में अनुसंधान, बीज, खेती के क्षेत्र, खरीद और प्रसंस्करण को जोड़ा गया है। शुरुआत संबंधी विज्ञप्ति पुष्टि करती है कि भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान में मिशन शुरू हुआ था; यह केवल प्रस्तावित कार्यक्रम नहीं रहा। [1][2][3]

मंत्रिमंडल की विज्ञप्ति के अनुसार घरेलू उत्पादन खपत के साथ नहीं बढ़ पाया था। इसलिए आपूर्ति बढ़ाने के लिए किसानों के फसल चयन और उन बाजार स्थितियों, जिनमें वे उपज बेचते हैं, दोनों पर ध्यान देना जरूरी है। [2]

परिचय

मिशन पोषण के उद्देश्य को कृषि आय के उद्देश्य से जोड़ता है। दलहन वनस्पति प्रोटीन उपलब्ध कराते हैं और घरेलू उत्पादन बढ़ाकर आयातित आपूर्ति पर निर्भरता घटाने का उद्देश्य रखा गया है। सरकार आत्मनिर्भरता को केवल खेती का क्षेत्र बढ़ाने के बजाय पूरी मूल्य श्रृंखला में समन्वित सुधारों का परिणाम मानती है। [1][2]

इसकी रूपरेखा में बेहतर किस्मों, खेती के तरीकों और भरोसेमंद खरीद व्यवस्था को साथ रखा गया है। किसान को उपयुक्त बीज मिलना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी फसल से मिलने वाला अपेक्षित प्रतिफल है। बीज सहायता और खरीद प्रतिबद्धताओं के माध्यम से मिशन इन जुड़ी हुई जरूरतों को संबोधित करता है। [2]

प्रमुख मुद्दे

  • क्षेत्र विस्तार और उत्पादकता बढ़ाना नीति के अलग उपाय हैं। मिशन धान के बाद खाली रहने वाली भूमि तथा अन्य उपयुक्त जमीन के उपयोग के साथ अंतर्वर्ती खेती और विविधीकरण का प्रस्ताव करता है। क्षेत्रीय परीक्षण और समूह की जरूरतों के अनुसार उपाय यह स्वीकार करते हैं कि हर जगह एक ही किस्म या खेती का तरीका लागू नहीं किया जा सकता। [2]
  • खरीद व्यवस्था भी विशिष्ट है। आश्वासन चुनी हुई दालों, भाग लेने वाले राज्यों और समझौता करने वाले पंजीकृत किसानों से संबंधित है। इसे हर दलहन किसान की उपज की बिना शर्त खरीद मानने से कार्यक्रम की वास्तविक व्यवस्था स्पष्ट नहीं होगी। [2]

महत्व

  • पीआईबी ने तीसरे अग्रिम अनुमान के तहत 2025–26 में दलहन उत्पादन 274.09 लाख टन बताया है, जबकि 2024–25 में यह 256.83 लाख टन था। प्रति हेक्टेयर उपज भी 926 से बढ़कर 957 किलोग्राम बताई गई है। ये संबंधित वर्षों के राष्ट्रीय संकेतक हैं; विज्ञप्ति यह स्थापित नहीं करती कि सुधार का कितना हिस्सा मिशन के कारण आया। [1]
  • इन्हीं वर्षों में दलहन आयात का बताया गया मूल्य ₹46,427.60 करोड़ से घटकर ₹31,793.59 करोड़ हुआ। इससे आयात पर खर्च घटने का सीमित निष्कर्ष निकलता है। यह आयात की भौतिक मात्रा में समान कमी या आत्मनिर्भरता हासिल हो जाने का प्रमाण नहीं है। [1]

चुनौतियाँ और संतुलित विश्लेषण

  • प्रसंस्करण ढांचे की प्रगति को उसके चरण के अनुसार समझना जरूरी है। नियोजित नेटवर्क के अंतर्गत पीआईबी ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को 528 इकाइयां आवंटित होने की जानकारी दी है। अलग से पीएमकेएसवाई के सीईएफपीपीसी घटक में 23 दलहन प्रसंस्करण परियोजनाएं स्वीकृत बताई गई हैं, जिनमें 18 पूरी हुईं। आवंटन, स्वीकृति और पूर्णता अलग चरण हैं। [1]
  • वर्षगांठ विज्ञप्ति के कुछ खरीद आंकड़ों की फसल-मौसम संबंधी समयरेखा स्पष्ट नहीं है। इसलिए उन्हें यहां पहली वर्षगांठ तक सिद्ध परिणाम नहीं माना गया है और शामिल नहीं किया गया है। खरीद की प्रतिबद्धताएं कार्यक्रम की रूपरेखा समझने के लिए प्रासंगिक रहती हैं। [1][2]

आगे की राह

  • क्रियान्वयन में क्रमिक बीज उत्पादन योजनाओं को क्षेत्रीय परीक्षण, किसानों के लिए प्रदर्शनों और प्रमाणित बीज की उपलब्धता से जोड़ना चाहिए। मृदा स्वास्थ्य, मशीनीकरण, संतुलित उर्वरक उपयोग और पौध संरक्षण के साथ मंत्रिमंडल द्वारा प्रस्तावित समन्वय बीज की गुणवत्ता को बेहतर फसल प्रदर्शन में बदलने का व्यावहारिक आधार देता है। [2]
  • निगरानी में हर गतिविधि का वास्तविक चरण बताया जाना चाहिए। साथी के माध्यम से बीजों का रिकॉर्ड और राष्ट्रीय, राज्य तथा जिला स्तर की निगरानी इसमें सहायता कर सकती है। पीआईबी ने रबी 2025–26 में 9.25 लाख बीज किट वितरित होने की जानकारी दी है। यह समय स्पष्ट करने वाला वितरण संकेतक है, जिसका आकलन दीर्घकालीन लक्ष्यों से अलग किया जा सकता है। [1][2]

निष्कर्ष

मिशन की पहली वर्षगांठ भविष्य के बड़े लक्ष्यों के साथ क्रियान्वयन के प्रमाण भी सामने रखती है। उचित मूल्यांकन में राष्ट्रीय अनुमान, समय स्पष्ट करने वाले वितरण आंकड़े और प्रसंस्करण के चरण अलग रखे जाते हैं। मुख्य नीति कसौटी यह है कि बेहतर बीज व्यवस्था और भरोसेमंद बाजार मिलकर घरेलू दलहन उत्पादन तथा पोषण सुरक्षा को स्थायी समर्थन देते हैं या नहीं। [1][2]

प्रारंभिक परीक्षा हेतु तथ्य

  • मिशन अरहर, उड़द और मसूर पर केंद्रित है। खरीद पीएम-आशा की मूल्य समर्थन योजना के तहत नैफेड और एनसीसीएफ के माध्यम से होनी है। [2]
  • वर्षगांठ विवरण में 87.5 लाख मुफ्त बीज किट का लक्ष्य है; पहले की मंत्रिमंडल विज्ञप्ति में पूर्णांक के रूप में 88 लाख बताया गया था। ये कार्यक्रम के लक्ष्य के विवरण हैं, अलग-अलग वितरण नहीं। [1][2]
  • मिशन में 126 लाख क्विंटल प्रमाणित बीज वितरण और 1,000 प्रसंस्करण इकाइयां स्थापित करने की योजना है। दोनों कार्यक्रम के लक्ष्य हैं। [1][2]
  • SATHI का पूरा नाम Seed Authentication, Traceability & Holistic Inventory है। यह बीज आपूर्ति श्रृंखला का रिकॉर्ड रखने से संबंधित है। [1][2]

महत्वपूर्ण शब्द

  • धान के बाद खाली भूमि: धान की फसल के बाद बिना खेती छोड़ी गई जमीन; मिशन ऐसी भूमि में दलहन खेती का प्रस्ताव करता है। [2]
  • प्रमाणित बीज: मिशन में बताई गई संगठित उत्पादन और प्रमाणन व्यवस्था के माध्यम से उपलब्ध कराया जाने वाला बीज। [2]
  • समूह आधारित दृष्टिकोण: उत्पादन क्षेत्रों के समूह की जरूरतों के अनुसार उपाय तय करना। [2]
  • अग्रिम अनुमान: विज्ञप्ति में अनुमान के रूप में बताए गए उत्पादन आंकड़े; इन्हें यहां अंतिम परिणाम नहीं माना गया है। [1]
  • मूल्य श्रृंखला: बीज आपूर्ति और खेती से लेकर खरीद, भंडारण तथा प्रसंस्करण तक जुड़ी गतिविधियां। [2][3]

स्रोत एवं तथ्य-जाँच

  1. [1] India’s Mission for Aatmanirbharta in Pulses — anniversary explainer
  2. [2] Cabinet approval of the Mission for Aatmanirbharta in Pulses
  3. [3] Launch of agricultural schemes at the Indian Agricultural Research Institute