अध्ययन संग्रह — यह पुरानी घटना पर आधारित विश्लेषण है, आज की खबर नहीं।
शास्त्रीय भाषाएँ: मान्यता से अध्ययन की ओर बढ़ते स्वीकृत केंद्र
घटना / स्रोत की तारीख: 03 Oct 2026
GS 1: भारतीय संस्कृति में प्राचीन से आधुनिक काल तक कला रूपों, साहित्य और वास्तुकला के प्रमुख पहलू। GS 2: शिक्षा से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास एवं प्रबंधन के मुद्दे।
उच्च शिक्षा विभाग ने असमिया, बांग्ला, मराठी, पाली और प्राकृत अध्ययन के पाँच उत्कृष्टता केंद्र मंजूर किए। 3 अक्टूबर का विकास संस्थागत मंजूरी है; इन भाषाओं को शास्त्रीय दर्जा मंत्रिमंडल ने 3 अक्टूबर 2024 को पहले ही मंजूर किया था।[1][2]
पहले विषय को समझें
केंद्रों की आवश्यकता
शास्त्रीय भाषा की मान्यता और निरंतर अकादमिक कार्य अलग जिम्मेदारियाँ हैं। स्वीकृत केंद्रों का कार्य शोध, संरक्षण, डिजिटलीकरण, प्रसार और क्षेत्रीय अकादमिक परिवेश मजबूत करना है।[1]
शास्त्रीय दर्जे का अर्थ
यह दर्जा निर्धारित भाषायी और साहित्यिक मानदंडों पर आधारित मान्यता है। इसे इस दावे के समान नहीं मानना चाहिए कि मान्यता प्राप्त भाषा का प्रत्येक वर्तमान रूप प्राचीन काल से अपरिवर्तित है।[2]
मान्यता का सत्यापित कालक्रम
साहित्य अकादमी के अंतर्गत भाषाविज्ञान विशेषज्ञ समिति ने 25 जुलाई 2024 को मानदंड संशोधित किए। मंत्रिमंडल ने 3 अक्टूबर 2024 को मराठी, पाली, प्राकृत, असमिया और बांग्ला को शास्त्रीय दर्जा मंजूर किया।[2]
संस्थागत मंजूरी
उच्च शिक्षा विभाग द्वारा पाँच उत्कृष्टता केंद्रों की मंजूरी 3 अक्टूबर 2026 को बताई गई। वर्तमान सत्यापित विकास मंजूरी है; उससे केंद्रों का पूर्ण संचालन या प्राप्त शोध परिणाम स्थापित नहीं होते।[1]
मेजबान संस्थान
असमिया केंद्र तेजपुर विश्वविद्यालय, बांग्ला केंद्र विश्वभारती विश्वविद्यालय और मराठी केंद्र डेक्कन कॉलेज स्नातकोत्तर एवं शोध संस्थान में होगा। पाली केंद्र ओडिशा केंद्रीय विश्वविद्यालय और प्राकृत केंद्र गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय में होगा।[1]
प्रमाण के मानदंड
संशोधित मानदंडों में 1,500–2,000 वर्ष की प्राचीनता, विरासत में मिला प्राचीन साहित्य, ज्ञान ग्रंथ, विशेषतः कविता के साथ गद्य ग्रंथ, और अभिलेखीय तथा शिलालेखीय प्रमाण शामिल हैं। सूची प्रत्येक ज्ञान या गद्य ग्रंथ के लिए अलग शिलालेखीय पुष्टि अनिवार्य नहीं करती।
अभिलेखीय प्रमाण यहाँ उत्कीर्ण लेखों से संबंधित है।[2]
संदर्भ: यह विषय क्यों महत्वपूर्ण है
नई मंजूरी पहले की शास्त्रीय मान्यता के बाद आई है; यह दोबारा मान्यता देना नहीं है। भाषाविज्ञान विशेषज्ञ समिति ने 25 जुलाई 2024 को पात्रता मानदंड संशोधित किए और मंत्रिमंडल ने 3 अक्टूबर 2024 को पाँच भाषाओं को मंजूरी दी। 3 अक्टूबर 2026 की विज्ञप्ति उनके अध्ययन के लिए संस्थागत व्यवस्था से संबंधित है।[1][2]
ये केंद्र 2024 की विज्ञप्ति में बताई गई मौजूदा संस्थागत सहायता व्यवस्था से जुड़ते हैं। संस्कृत को बढ़ावा देने के लिए 2020 में तीन केंद्रीय विश्वविद्यालय स्थापित हुए। केंद्रीय शास्त्रीय तमिल संस्थान प्राचीन ग्रंथों के अनुवाद, शोध और पाठ्यक्रमों को समर्थन देता है। शास्त्रीय कन्नड़, तेलुगु, मलयालम तथा ओड़िया केंद्र मैसूरु के भारतीय भाषा संस्थान के अंतर्गत कार्य करते हैं। विश्वविद्यालयों की पीठ और राष्ट्रीय पुरस्कार अतिरिक्त सहायता देते हैं। इससे नई मंजूरियाँ व्यापक अकादमिक ढाँचे में स्थान पाती हैं।[2]
परिचय
स्वीकृत केंद्र मान्यता प्राप्त भाषायी विरासत को अकादमिक आधार देना चाहते हैं। उनके कार्य में शोध, संरक्षण, डिजिटलीकरण, प्रसार और क्षेत्रीय अकादमिक परिवेश को मजबूत करना शामिल है। विश्लेषण का प्रश्न इन कार्यों को परस्पर सहायक बनाना है, साथ ही नीतिगत मान्यता और संस्थानों के लगातार शोध कार्य का अंतर बनाए रखना है।[1]
प्रमुख मुद्दे
- संशोधित मानदंड केवल आयु तक सीमित नहीं हैं। 1,500–2,000 वर्ष की प्राचीनता और विरासत में मिले साहित्य के साथ वे ज्ञान ग्रंथ, विशेषतः कविता के साथ गद्य ग्रंथ, तथा अभिलेखीय और शिलालेखीय प्रमाण सूचीबद्ध करते हैं। ये प्रमाण की प्रासंगिक श्रेणियाँ हैं; प्रत्येक ग्रंथ के लिए शिलालेखीय पुष्टि की शर्त नहीं। इनका व्यापक दायरा अध्ययन कार्यक्रमों को साहित्यिक, ज्ञानपरक और शिलालेखीय सामग्री अलग उपयुक्त तरीकों से समझने देता है, एक समान पाठीय कसौटी से नहीं।[2]
- प्राचीन और बाद के रूपों के बीच संभावित अंतर या निरंतरता का टूटना स्पष्ट रूप से स्वीकार्य है। इसलिए मान्यता का अर्थ आज के प्रयोग में प्राचीन भाषा का बिना बदलाव दोहराव नहीं है। शोध ऐतिहासिक सामग्री तथा बाद के रूपों के संबंध का अध्ययन कर सकता है; अंतर को अपने आप शास्त्रीय दर्जे के विरुद्ध नहीं माना जाना चाहिए।[2]
महत्व
- मेजबान व्यवस्था प्रत्येक भाषा के लिए निश्चित संस्थान देती है: असमिया के लिए तेजपुर, बांग्ला के लिए विश्वभारती, मराठी के लिए डेक्कन कॉलेज, पाली के लिए ओडिशा केंद्रीय विश्वविद्यालय और प्राकृत के लिए गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय। इससे स्वीकृत केंद्र की संस्थागत जिम्मेदारी स्पष्ट होती है; कर्मचारियों, वित्तपोषण विवरण या पूरे परिणामों की पुष्टि नहीं होती।[1]
- तमिल का पूर्व संस्थागत उदाहरण दिखाता है कि अनुवाद, शोध और अध्यापन कैसे जुड़ सकते हैं। अनुवाद ऐतिहासिक ग्रंथ अतिरिक्त पाठकों तक पहुँचाता है; शोध उनकी भाषायी तथा ज्ञान परंपराओं की व्याख्या करता है; पाठ्यक्रम इस अध्ययन को अकादमिक शिक्षा में लाते हैं। ये कार्य नए केंद्रों के शोध और प्रसार दायित्व समझाते हैं। वे कार्यान्वयन का प्रासंगिक पूर्व उदाहरण देते हैं, लेकिन इसका अर्थ पाँचों केंद्रों की संगठनात्मक संरचना बिल्कुल समान होना नहीं है।[1][2]
चुनौतियाँ और संतुलित विश्लेषण
- प्रमाण का विस्तृत आधार व्यावहारिक अकादमिक काम सामने रखता है। कविता, गद्य, ज्ञान ग्रंथ और शिलालेखों के रूप के अनुसार उनका दस्तावेजीकरण तथा व्याख्या आवश्यक है। इन श्रेणियों को अपनाने वाला कार्यक्रम संग्रह केवल कविता के आसपास व्यवस्थित करने के बजाय पाठीय अध्ययन को ऐतिहासिक भाषायी प्रमाण से जोड़ सकता है। यह संशोधित मानदंड और शोध दायित्व का प्रयोग है, नया घोषित अनिवार्य पाठ्यक्रम या पहले से शुरू परियोजनाओं का दावा नहीं।[1][2]
- क्षेत्रीय अकादमिक परिवेश मजबूत करने के लिए केंद्रों के कार्यों का जुड़ना आवश्यक है। शोध ऐतिहासिक सामग्री की व्याख्या कर सकता है, संरक्षण उसकी उपलब्धता बनाए रख सकता है और प्रसार अध्ययन को व्यापक पाठक वर्ग तक पहुँचा सकता है। व्यावहारिक चुनौती इन गतिविधियों को इस तरह जोड़ना है कि डिजिटल संग्रह उपयोगी शोध संसाधन बनें, केवल अलग रूपांतरण परियोजनाएँ न रहें। यह संयुक्त कार्यक्षेत्र से निकला कार्यान्वयन आकलन है, पूरे काम का दावा नहीं।[1]
आगे की राह
- कार्यान्वयन रिपोर्ट में केंद्र मंजूरी, वास्तविक स्थापना और शोध, संरक्षण, डिजिटलीकरण तथा प्रसार के परिणाम अलग रखने चाहिए। यह सुझाया रिपोर्टिंग ढाँचा घोषित कार्यक्षेत्र से निकलता है। इससे पाठक समझ सकेंगे कि कौन-सा संस्थागत चरण पूरा हुआ है, बिना घोषणा को अनबताई उपलब्धियों का श्रेय दिए।[1]
- अध्ययन कार्यक्रमों को संशोधित मानदंडों के विविध प्रमाण अपनाने चाहिए, जिनमें साहित्य, ज्ञान ग्रंथ और शिलालेख शामिल हैं। साथ ही प्राचीन और बाद के रूपों का सावधानी से अंतर करें। सुलभ प्रसार के सुझाव घोषित कार्य आगे बढ़ाने के तरीके हों, विज्ञप्ति द्वारा पहले ही लगाए गए अतिरिक्त दायित्व नहीं।[1][2]
निष्कर्ष
सत्यापित विकास पहले से शास्त्रीय मान्यता प्राप्त भाषाओं के अध्ययन संस्थानों की मंजूरी है। इसका महत्त्व दर्जे को निरंतर अकादमिक कार्य से जोड़ने में है। अगला मूल्यांकन वास्तविक स्थापना और ठोस परिणाम देखे तथा संशोधित मान्यता मानदंडों में मौजूद प्रमाण संबंधी अंतर बनाए रखे।[1][2]
प्रारंभिक परीक्षा हेतु तथ्य
मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
प्रश्न: स्वीकृत शास्त्रीय भाषा केंद्र मान्यता को संरक्षण और अध्ययन से कैसे जोड़ सकते हैं? संशोधित पात्रता मानदंडों का महत्त्व बताइए। (10 अंक; सुझाई गई उत्तर-लंबाई: 150 शब्द)
आदर्श उत्तर
स्वीकृत केंद्र शास्त्रीय मान्यता से निरंतर अकादमिक कार्य की ओर संस्थागत मार्ग देते हैं। उनके कार्य शोध, संरक्षण, डिजिटलीकरण, प्रसार और क्षेत्रीय अकादमिक परिवेश हैं। संरक्षण सामग्री बचाता है, डिजिटलीकरण पहुँच बढ़ा सकता है और शोध व्याख्या देता है; ये पूरक कार्य हैं।[1]
कालक्रम स्पष्ट रहना चाहिए। जुलाई 2024 में मानदंड संशोधन, अक्टूबर 2024 में मान्यता और अक्टूबर 2026 में केंद्र मंजूरी हुई। मंजूरी पूरे संस्थान या शोध परिणाम स्वयं स्थापित नहीं करती।[1][2]
संशोधित मानदंड प्राचीनता, विरासत में मिले साहित्य, ज्ञान और गद्य ग्रंथ तथा अभिलेखीय या शिलालेखीय प्रमाण शामिल करते हैं। प्राचीन और बाद के रूपों का अंतर या असततता भी स्वीकार्य है। इसलिए मान्यता विविध प्रमाण देखती है; अपरिवर्तित वर्तमान प्रयोग या प्रत्येक ग्रंथ की शिलालेखीय पुष्टि अनिवार्य नहीं है।[2]
मूल्यांकन स्थापना और घोषित कार्यों के परिणाम अलग देखे। इससे नीतिगत मान्यता ठोस अध्ययन से जुड़ेगी, बिना यह मान लिए कि डिजिटल रूपांतरण या संस्थागत मंजूरी अकेले विरासत संरक्षण पूरा कर देती है।[1][2]
महत्वपूर्ण शब्द
स्रोत एवं तथ्य-जाँच
UPSC Prelims अभ्यास प्रश्न
इस संपादकीय पर आधारित मौलिक अभ्यास प्रश्न
प्रश्न 1
संशोधित शास्त्रीय भाषा मानदंडों पर विचार कीजिए: 1. प्राचीनता एक प्रासंगिक मानदंड है, लेकिन अकेला मानदंड नहीं। 2. ज्ञान और गद्य ग्रंथ तथा अभिलेखीय या शिलालेखीय प्रमाण प्रासंगिक श्रेणियों में शामिल हैं। 3. प्राचीन और बाद के रूपों के बीच संभावित असततता अनिवार्य रूप से अयोग्य बनाती है। कौन-से कथन सही हैं?
उत्तर और व्याख्या देखें
सही उत्तर: (A)
कथन 1 और 2 प्राचीनता तथा अन्य पाठीय या शिलालेखीय प्रमाण का सही संयोजन बताते हैं।[2] कथन 3 गलत है, क्योंकि बाद के रूपों से संभावित अंतर या असततता स्वीकार्य है। A सही है; B, C और D गलत बहिष्करण नियम शामिल करते हैं।
प्रश्न 2
निम्नलिखित भाषा–मेजबान युग्मों पर विचार कीजिए: 1. असमिया — तेजपुर विश्वविद्यालय 2. पाली — गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय 3. प्राकृत — ओडिशा केंद्रीय विश्वविद्यालय कितने युग्म स्वीकृत केंद्रों के मेजबान सही बताते हैं?
उत्तर और व्याख्या देखें
सही उत्तर: (B)
युग्म 1 सही है। युग्म 2 गलत है, क्योंकि पाली केंद्र ओडिशा केंद्रीय विश्वविद्यालय में है। युग्म 3 गलत है, क्योंकि प्राकृत केंद्र गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय में है।[1] केवल एक सही है; इसलिए B सही और अन्य संख्याएँ गलत हैं।
प्रश्न 3
एक स्वीकृत केंद्र शोध का आधार बनाए रखते हुए मुख्यतः शास्त्रीय भाषा संबंधी ज्ञान के व्यापक प्रसार का कार्यक्रम बनाना चाहता है। कौन-सा प्रस्ताव इस कार्य से सबसे सीधे मेल खाता है?
उत्तर और व्याख्या देखें
सही उत्तर: (C)
C व्यापक पहुँच और प्रसार को सबसे सीधे संबोधित करता है; पूर्व PIB विवरण प्राचीन ग्रंथों का अनुवाद मौजूदा शास्त्रीय भाषा सहायता गतिविधि भी बताता है।[1][2] A मुख्यतः दस्तावेजीकरण और संरक्षण, B उन्नत शोध तथा D क्षेत्रीय अकादमिक परिवेश से संबंधित है। सभी उपयोगी गतिविधियाँ हैं, लेकिन उनके मुख्य कार्य प्रश्न के प्रसार उद्देश्य से अलग हैं।